Laughing is Natural

हास्य व मानव व्यवहार

(मन- वैज्ञानिक अनुसन्धान खिलखिला कर हँसना)

“उम्- -ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन, दो आरजू में कट गए, दो इंतज़ार में …”

अक्सर हमारी जिंदगी ऐसे ही किसी शेर का एक एग्जाम्पल बनकर रह जाती है। लेकिन जिंदगी का ये अंदाज देखा जाए तो जिंदगी की तौहीन है। जिंदगी को काटने की बजाए हमें उसे जी भरकर जीतना सीखना चाहिए। आज की भाग दौर भरी ज़िंदगी, ऊपर से काम का प्रेशर हममे में से कई लोगों को तो याद भी न होगा कि पिछली बार कब खिलखिला कर हँसे थे। जबकि हँसना हम सभी के लिये अति महत्वपूर्ण- है किन्तु हम उसे नज़र अंदाज कर देते हैं। मित्रों हँसने से हमारी ज़िंदगी किस तरह स्वस्थ एवं खुशनुमा हो सकती है उसी के बारे में थोङी सी जानकारी शेयर करने की कोशिश – पसन्द आए तो हँसियेगा जरूर | अच्छी नींद, ईश्वर का ध्यान, खुलकर हँसना और संगीत से जुड़ना, ये सभी चीजें आपको तनाव से दूर रहे में मदद करेंगे। ईश्वर के ध्यान से मतलब केवल आस्था रखने से है, न कि किसी कर्मकांड में उलझने से। जब तनाव से दूर रहेंगे तो 75 की उम्र में भी जवाँ ही दिखेंगे।
“३ दोस्त दारू पिने के बाद Auto wale के पास आते हैं, Auto wale को पता होता है कि ये तिनो पिकर आए हैं| वो बस इंजिन चालू करके बंद करता है, और कहता है हम पहुँच गये | पहला दोस्त उसे पैसा देता है, दुसरा उसे धन्यवाद कहता है, तीसरी उसे जोरदार तमाचा जड देता है| Auto wale को लगता है की मैने जो किया वो शायद इसे पता चल गया! फिर भी वो हिम्मत करके पुछता है, ‘क्यु मारा? तिसरा: अगले बार Auto धीरे चलाना!”

तनाव, चिंता, भय, क्रोध, निराश, चिड़चिड़ाप- न, हड़बड़ी, अधीरता आदि नकारात्मक प्रवृत्तिय- ों से हमारी अंत:स्रावी ग्रंथियाँ खराब होती हैं जो शरीर में विभिन्न रोगों को निमंत्रण देने में अहं भूमिका निभाती हैं। जिस प्रकार अंधेरा और उजाला साथ—साथ नहीं रह सकते , ठीक उसी प्रकार मुस्कान के साथ रोग के उपरोक्त कारणों को स्वतः: दूर होना पड़ता है । जिस घर में अतिथि का आदर सत्कार नहीं होता, उस घर में समझदार मेहमान अधिक देर तक नहीं रहना चाहते। अत: यदि हमारा चेहरा सदैव मुस्कुराता- हुआ प्रसन्नचित- ्त रहे तो व्यक्ति अनेक रोगों से सहज ही बच सकता है। उसकी कार्यक्षमत- ा बढ़ जाती है, सोच सकारात्मक हो जाती है। दूसरी बात अकारण मुस्कुराने- से तनाव, भय, चिंता, अशांति, स्वतः: दूर भाग जाते हैं। प्रेम , मंत्री, आनंद, प्रसन्नता बढ़ने लगती है। प्रतिकूलता- में अपने चेहरे को मुस्कुराते- हुए रखना चाहिए एवं रोग की अवस्था में दवा की भाँति इसका उपयोग करना चाहिए। मात्र १० से १५ मिनट मुस्कुराने- से रक्तचाप चाहे बढ़े हो या कम हो, सामान्यतः हो जाता है। मधुमेह के रोग को दवा की आवश्यकता नहीं रहती।

जिंदगी के हर पल को इसी अंदाज के साथ जिएँ। आप जैसे हैं उसमें ही संतुष्ट रहें। हाँ, नई चीजें सीखने से पीछे न हटें, लेकिन खुद को बदले बगैर। याद रखिए हर एक व्यक्ति किसी न किसी गुण से सजा होता है। आज अगर कोई खुश या आनंदित होने की कोशिश करता है, तो उसकी ओर हर किसी की आँखे इस प्रकार देखती है, जैसे वह कोई बड़े गुनाह करने जा रहा हो| दरअसल, हमने खुशी को अजायबघर की चीज मान लिया है | इस लिए उसे हमेशा हैरानी की नजरो से देखने की आदत हो गई है, जीवन का इस तरह से देखने का जो नजरिया बना है, वह अधिकांश लोगों पर हावी हो गया है, सफलता की खुशी, साहस से कुछ हासिल करने की खुशी, परोपकार करने की खुशी और सबके प्रति विनम्रता से जो खुशी मिलती हैं इन सब खुशियों को हम भूल गए हैं | कोई दुसरा हमारे पति बुराई करें या निंदा करें, उद्वेगजनक बात कहे तो उसको सहज करने और उसे उत्तर न देने से बैर आगे नहीं बढ़ता | अपने ही मन में कह लेना चाहिए कि इसका सबसे अच्छा उत्तर है मौन. जो अपने कर्तव्य कार्य में जुटा रहता है और दुसरो के अवगुणों की खोज में नहीं रहता उसे आतंरिक प्रसन्नता रहती है | हंसने से हद्रय की एक्सरसाइज हो जाती है। रक्त का संचार अच्छी तरह होता है। हँसने पर शरीर से एंडोर्फिन रसायन निकलता है, ये द्रव्य ह्रदय को मजबूत बनाता है। हँसने से हार्ट-अटैक की संभावना कम हो जाती है। एक रिसर्च के अनुसार ऑक्सीजन की उपस्थिती में कैसा कोशिका और कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया- एवं वायरस नष्ट हो जाते हैं। ऑक्सीजन हमें हँसने से अधिक मात्रा में मिलती है और शरीर का प्रतिरक्षा- तंत्र भी मजबूत हो जाता है। यदि सुबह के समय हास्य ध्यान योग किया जाए तो दिन भर प्रसन्नता रहती है। यदि रात में ये योग किया जाये तो नींद अच्छी आती है। हास्य योग से हमारे शरीर में कई प्रकार के हारमोंस का स्राव होता है, जिससे मधुमेह, पीठ-दर्द एवं तनाव से पीङित व्यक्तियों- को लाभ होता है। हँसने से नकारात्मक ऊर्जा भी बढती है, खुशहाल सुबह से ऑफिस का माहौल भी खुशनुमा होता है |

“जो लोग हमेशा ऑफिस में ओवर टाइम करते है, क्या वो सबसे महेनती है?

नहीं, या तो वो बीबी से तंग है, या वो ऑफिस में किसी के संग है”|

किसी घटना की हास्यास्पद- प्रस्तुति को चुटकुला या परिहास कहते हैं। इसे अंग्रेज़ी में ‘जोक’ (joke) कहते हैं और इसे लतीफ़ा भी कहा जाता है। अक्सर कहा जाता है के “लतीफ़े की जान आख़री जुमले (अंतिम वाक्य) में होती है” – अंग्रेज़ी में इस वाक्य को ‘पंचलाइन’ (punchline) कहते हैं। लतीफ़ा एक छोटी सी कहानी हो सकता है या एक लघु वाक्यांश या वाक्य के रूप में भी हो सकता है। लतीफे प्राय: मित्रों एवं दर्शकों के मनोरंजनके सरल साधन हैं। चुटकुले सुनाने का उद्देश्य अट्टहास पैदा करना होता है। किन्तु किन्हीं कारणों से जब ऐसा नहीं हो पाता तो कभी-कभी चुटकुले का ही मजाक उड़ा दिया जाता है। तो दोस्त, क्यों न हम सब दो चार चुटकुले पढ कर या सुनकर अपने दिन की शुरुवात जोरदार हँसी के साथ करें। रोज एक घंटे हँसने से 400 कैलोरी ऊर्जा की खपत होती है, जिससे मोटापा भी काबू में रहता है। हँसने के लिये व्यक्ति बाह्य आलम्बनों पर निर्भर रहता है, जो हमारे पास सदैव उपस्थित नहीं होते । चुटकुलों के सहारे हम ३६५ दिन नहीं हँस सकते, क्योंकि नित्य नवीन ज्ञानवद्र्- धक प्रभावशाली- चुटकुले भी पढ़ने को नहीं मिलते और न ऐसे व्यक्तियों- का नियमित संपर्वक होता है, जो दूसरों को हँसाने में दक्ष होते हैं। आज कल कई हास्य क्लब भी तनाव भरी जिंदगी को हँसी के माध्यम से दूर करने का कार्य कर रहे हैं। एक ही समाज में विभिन्न कालों में नैतिक संहिता भी बदल जाती है| दूसरों से हमेशा आशा या अपेक्षा करना हमारे लिए नुकसानदायक- है। आप सिर्फ अपनी तरफ से दूसरों के साथ अच्छाई कीजिए और भूल जाइए, बदले में किसी भी तरह के व्यवहार को। यह चीज आपके मन को शांति देगी। नैतिकता/नै- िक मूल्य वास्तव में ऐसी सामाजिक अवधारणा है जिसका मूल्यांकन किया जा सकता है|

चाहे अकेले में हों, या समूह में, व्यक्ति को हँसना तो स्वयं ही होता है। आलम्बन भले ही कुछ बंद कर मन ही मन जितनी लंबी देर एक ही श्वास में हँस सके, बिना आवाज निकाले हँसना चाहिए। जिससे ऐसी हँसी से प्राणायाम का भी लाभ भी स्वत: मिल जाता है। इस प्रकार बार बार पुनरावर्तन- कर हँसने से हास्य योग का लाभ मिल जाता है। कोई भी प्रवृत्ति का सर्वमान्य स्पष्ट मापदण्ड नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति को स्वविवेक और स्वयं की क्षमताओं तथा हँसने से होने वाली प्रतिक्रिय- ाओं का सजगता पूर्वक ध्यान रख अपने लिए उपयुक्त और आवश्यक विधियों का चयन करना चाहिए, न कि देखा देखी , सुनी सुनाई पद्धति के आधार पर । प्रदूषण रहित स्वच्छ एवं खुले प्राणवायु वाले वातावरण में प्रात: काल उदित सूर्य के सामने हँसना अपेक्षाकृत- अधिक लाभप्रद होता है, क्योंकि हास्य क्रिया के साथ—साथ सौर ऊर्जा एवं आक्सीजन अधिक मात्रा में सहज प्राप्त हो जाते हैं। मुस्कान न केवल एक जीवन्त प्रक्रिया है, उससे भी कहीं अधिक एक सामाजिक, मनोवैज्ञान- िक घटना भी है, जिससे दो व्यक्तियों- के बीच शुभ संवाद आरंभ होने में सुविधा मिलती है। जब दो परिचित मिलते हैं तो दूर से ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। अतिथियों का मुस्कुराते- हुए ही स्वागत किया जाता है। अर्थात् मुस्कान हमारे जीवन में आनंद, सुख, प्रसन्नता की सूचक होती है। मुस्कान की उपमा खिले हुए फूल से की जाती है। जिस प्रकार खिला हुआ फूल अच्छा लगता है, ठीक उसी प्रकार मुस्कान से व्यक्ति को सुख की अनुभूति होती है। जिसके चेहरे की मुस्कुराहट- चली जाती है, उसके जीवन की प्रसन्नता चली जाती है। जिसके जितनी ज्यादा मुस्कान रहती है, उतना अधिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है। मुस्कुराना- प्रकृति की मानव को अनुपम देन है जो उसको स्वस्थ सुखी प्रसन्नचित- ्त रखने का उसके स्वयं के हाथ में सहज, सरल, सस्ता, प्रभावशाली- उपाय है। जिसमें किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव- की संभावना नहीं होती। जितना अधिक व्यक्ति आंतरिक मुस्कुराहट- से ओतप्रोत रहता है, उतनी ही उसकी सहनशीलता बढ़ती जाती है। प्रतिकूलता- और वियोग में समतामय जीवन जी सकता है। उसकी परदोष दृष्टि समाप्त होने लगती है। सकारात्मक होने लगता है जो मानव जीवन की सफलता एवं उद्देश्य प्राप्ति का मूलाधार होती है। सकारात्मक भाव पैदा होते हैं। जिससे शरीर के लिए उपयोगी रसायन पैदा होने लगते हैं। कार्य क्षमता बढ़ जाती है। अशांति की आग में आकुल व्याकुल व्यक्ति के लिए हास्य एक वरदान होता है। मुस्कुराहट- सभी आकर्षक लगती है। जब वह होठों के साथ—साथ आँखों से भी नजर आये। मुस्कुराहट- से अच्छा दूसरा तोहफा है और दवा प्राय: हमारे पास नहीं होती। मनोवैज्ञान- िकों और साहित्य पर अनुसन्धान करने वालों ने इस प्रश्न पर काफी गहराई से अध्ययन किया है के चुटकुलों पर लोग बेबसी से हँसते क्यों हैं। इस विषय को लेकर बहुत से सूक्ष्म प्रश्न सामने आते हैं, जैसे कि ऐसा क्यों है के एक ही चुटकुला जब एक आदमी सुनाये तो लोग हँसते हैं लेकिन दूसरा सुनाये तो नहीं हँसते? यह माना जाता है के कई चुटकुलों में तनाव के उतार-चढ़ाव का बहुत महत्वपूर्ण- योगदान है। जैसे कि एक चुटकुला है कि –

दो पागल पागलख़ाने से फ़रार हो गए। पुलिस उन्हें ढूँढती-ढूँ- ती थक गयी, तब कहीं जा कर उनमे से एक हाथ आया। पुलिसवाले ने उस से पूछा – “भई, तेरा साथी कहाँ है?” उसने कहा – “दरअसल वो भागा था, मैं तो उसे वापस लाने उसके पीछे भागा था।” पुलिसवाले ने कहा – “शाबाश, यह तो बहुत अच्छा किया। फिर, वो मिला?” उसने कहा – “वो भागकर नदी में गिर गया था और डूब रहा था। नदी में भयंकर बाढ़ आई हुई थी। मुझे तैरना आता है, इसलिए अन्दर जा कर किसी तरह उसे बचाया और बाहर निकला।” पुलीसवाले ने कहा – “अरे! तू तो बिलकुल पागल नहीं लगता। हम पागलख़ाने से बात कर के तुझे रिहा करवा लेंगे। अच्छा, तो बता वो गया कहाँ? निकलते ही भाग गया क्या?” पागल ने कहा – “नहीं, नदी में गीला हो गया था न, इसलिए मैंने उसे सूखने के लिए लटका दिया।”

इस लतीफ़े में शुरू में पागलों के भाग उठने से तनाव पैदा होता है। और फिर लगता है के यह तो पागल है ही नहीं, इसलिए तनाव कम होता है लेकिन थोड़ा सा शक़ बना रहता है। और फिर एकदम से तनाव फिर से भड़क उठता है। किसी भी लतीफ़े में यह ज़रूरी है के तनाव का यह उतार-चढ़ाव आकस्मिक लगे, यानि जहां तनाव बढ़ने कि उम्मीद हो वहाँ उल्टा घट जाए और जहां घटने कि संभावना लगे वहां उल्टा बढ़ जाए। अच्छे चुटकुला सुनाने वाले इस तनाव के बहाव को अपने नियंत्रण में रखते हैं। कुछ लतीफ़ों में तनाव का इतना उतार-चढ़ाव नहीं होता लेकिन उनमें भी उम्मीद से कुछ विपरीत होता है जो व्यंग्यपूर- ्ण ढंग से चौंका जाए।

समय की कीमत पहचानिए और जिंदगी के हर पल को भरपूर जीने की कोशिश कीजिए। याद रखिए बीता हुआ कल जल चुके पटाखे की तरह होता है व आने वाला कल बिना छूटे पटाखे की तरह, जबकि हमारा आज आसमान में रंग बिखेर रही आतिशबाजी जैसा होता है। इसलिए उसका मजा उसी पल लीजिए। खेद का विषय है कि हमारी शिक्षा केवल बौद्धिक विकास पर ध्यान देती है. हमारी शिक्षा शिक्षार्थी- में बोध जाग्रत नहीं करती वह जिज्ञासा नहीं जगाती जो स्वयं सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करे और आत्मज्ञान की ओर ले जाये, सही शिक्षा वही हो सकती है जो शिक्षार्थी- में नैतिक और आध्यात्मिक- मूल्यों को विकसित कर सके | विद्वानों ने कहा है ” जो व्यक्ति आनंदित और तनावमुक्त रहेगा, वह उतनी ही जल्दी मनचाही चीजो को प्राप्त कर लेगा, बात बात में हताश-निराश होने बाले लोग जीवन में बहुत पीछे छूटते चले जाते हैं,” वैज्ञानिक कहते हैं कि आनंद के समय में आपकी जीवन-उर्जा काम केंद्र से ऊपर मस्तिक की ओर प्रवाहित होने लगती है, निराशा के समय वह मूलाधार की ओर जाने लगती है, यानि जो कुछ शक्ति आपकी, वह विसर्जित होकर शारीर से बाहर चली जाती है | आनंदीत जीवन जीने के लिए जरुरी है की लोग बिना शर्त के आनंदित जीवन जीने का अभ्यास करें, जिसने भी शर्त लगाई हैं बह शर्तो के चंगुल में फंसकर रह गया है |

प्रसन्न चित होकर बात करना , थोडा मुस्कराते जाना प्रभाव डालने का बहुत अच्छा तरीका है । थोडा मुस्कराने से चहरे के आस पास की नसें इस प्रकार तनती हैं की उनमें मस्तिष्क की प्रभावशाली- विद्युत धारा खिंच जाती है । यह केवल उन नसों में होकर होठों या गालों पर ही प्रदर्शित नहीं होती है वरन नेत्रों में भी उसका एक बड़ा भाग पहुंचता है और वे भी चमकने लग जाते हैं । वैज्ञानिक यंत्रों द्वारा इस बात की पुष्टि हो चुकी है की हँसते हुए चहरे में साधारण दशा की अपेक्षा करीब 5 गुना विद्युत अधिक होती है । यह दूसरों पर आश्चर्यजनक- प्रभाव डालती है और जब लौट कर आती है तो रक्त संचार और सानु मंडल पर बड़ा हितकारी प्रभाव डालती है । प्रकृति भी हमें संदेश देती है- बारिश के बाद खिली धूप, सतरंगी इन्द्रधनुष- , खिले हुए रंग -बिरंगे फूल , उडती तितलियाँ , आह्लादित कोयल की कुहू -कुहू , लहलहाते हरे भरे पेङ अपनी खुशी का एहसास दिलाते हैं। उनकी इसी खुशी को देख कर हम सब का मन भी खुश होता है, उसी तरह जब हम सब खुश एवं स्वस्थ रहेंगे तो अपने आसपास का वातावरण भी खुशनुमा बना सकते हैं।

सोचिये अगर जरा सी मुस्कान से फोटो अच्छी आ सकती है तो खुलकर हँसने से जिंदगी की तस्वीर कितनी खूबसूरत हो सकती है। जब स्वास्थ और सामाजिक क्षेत्र में हँसी के अनगिनत फायदें हैं, तो हँसना तो लाजमी है। और यकीन मानिये दुनिया का बड़े से बड़ा काम जोश, जूनून और भरपूर उत्साह से ही पूरा होता है। हंसी यह बतलाती है की आप अपने से प्रेम करते हैं । हंसी स्वयं के लिए हैं । यह अपनी शक्तियां अर्जित करना हैं । यह हीलिंग हैं । हंसी शारीरिक , मानसिक और आध्यत्मिक स्वास्थ्य प्राप्त करने का सर्वश्रेष्- ट माध्यम है । हँसना स्वयं के लिए दिव्यता प्राप्त करना है । इसलिए मुस्कराते रहिये|

नैतिक मूल्यों का विस्तार व्यक्ति से विश्व तक, जीवन के सभी क्षेत्रों में होता है. व्यक्ति-पर- वार, समुदाय, समाज, राष्ट्र से मानवता तक नैतिक मूल्यों की यात्रा होती है. नैतिक मूल्यों के महत्त्व को व्यक्ति समाज राष्ट्र व विश्व की दृष्टियों से देखा समझा जा सकता है. समाजिक जीवन में तेज़ी से हो रहे परिवर्तन के कारण उत्पन्न समस्याओं की चुनौतियों से निपटने के लिए और नवीन व प्राचीन के मध्य स्वस्थ अंतः क्रिया को सम्भव बनाने में नैतिक मूल्य सेतु-हेतु का कार्य करते हैं. नैतिक मूल्यों के कारण ही समाज में संगठनकारी शक्तियां व प्रक्रिया गति पाती हैं और विघटनकारी शक्तियों का क्षय होता है| कार्टिसोल हार्मोन का स्तर उन लोगों में अधिक पाया जाता है जो उदास , ग़मगीन और असंतुष्ट रहते हैं । यह हार्मोन अवसाद, तनाव , मानसिक झुंझलाहट तो पैदा करता ही है साथ ही साथ सामान्य रक्तचाप, धड़कन, मन्श-पेशिय- ं में तनाव और पसीने का स्तर भी बड़ा देता है । एक रिसर्च के अनुसार ऑक्सीजन की उपस्थिती में कैंसर कोशिका और कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया- एवं वायरस नष्ट हो जाते हैं। ऑक्सीजन हमें हँसने से अधिक मात्रा में मिलती है और शरीर का प्रतिरक्षा- तंत्र भी मजबूत हो जाता है। हंसने से त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता में महत्वपूर्ण- वृद्धि होती है । अधिक हंसने वाले लोगों के ई . ई .जी . में अल्फा तरंगों [ 8 – 1 3 साइकल्स / सेकंड ] की बहुलता देखी गई है यह तरंगें तनाव शामक होती हैं और मांस पेशियों को शिथिल करती हैं । नियमित व्यायाम, दिनचर्या और संतुलित खान-पान आपकी उम्र के बढ़ने की गति को कम करता है। इस बारे में गंभीरता से सोचें। साल में एक बार नियमित जाँच करवाएँ। चिकित्सक द्वारा बताई गई औषधियाँ समय पर लें और उसके द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें। स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं को जरूर अपनाएँ।

मानव ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसमें हँसने की क्षमता होती है। यह उसका स्वभाव भी है तथा उसके खुशी की अभिव्यक्ति- का माध्यम भी। किसी बात पर मुस्कुराना- अथवा हँसना किसी को देखकर हँसना, कुछ व्यंग्य सुनकर हँसना, कुछ पढ़कर हँसना, किसी को हँसते हुए देखकर हँसना, किसी से मुस्कुराते- हुए मिलना, खुशी के प्रसंगों पर मुस्कुराना- मानव व्यवहार की सहज क्रियाएँ हैं। आज के सभ्य समाज में अकारण हँसने वालों को मूर्ख अथवा पागल समझा जाता है। सामाजिक मर्यादाओं के प्रतिकूल होने से बिना बात हँसने से लज्जा आती है। अत: घर में बच्चों के अलावा अन्य परिजन विशेषकर महिलाओं एवं वृद्धों का, धर्म संघ में संतो का, कार्यालय में पदाधिकारिय- ों एवं नेताओं का समूह में ऐसी हँसी हँसना प्राय: असंभव है।

“तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था; पता नहीं वो दीए क्यूँ बुझा के रखता था

बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लक्कें- भर लीं, मै दोस्तों की दुआएँ बचा के रखता था

वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों- इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा, कि मैं किवाड़ से सांकल हटा के रखता था

हमेशा बात वो करता था घर बनाने की, मगर मचान का नक़्शा छुपा के रखता था

मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद, कि हर कदम मैं बहुत आज़मा के रखता था”

-ज्ञानप- रकाश विवेक

जब मुस्कान हँसी में बदल जाती है तो स्वास्थ्यव- द्र्धक औषधि का कार्य करने लगती है। हँसना स्वस्थ शरीर की पहचान है जो मानसिक प्रसन्नता के लिए आवश्यक है। नियमित हँसने से शरीर के सभी अवयव ताकतवर और पुष्ट होते हैं। हास्य तनाव का विरेचन है। सच्चा हास्य तोप के गोले की तरह छूटता है और मायूसी की चट्टान को बिखेर देता है। हास्य से रोम रोम पुलकित होते हैं, दु:खों का विस्मरण होता है, खून में नई चेतना आती है। शरीर में कुछ भाग हास्य ग्रंथियों के प्रति विशेष संवेदनशील होते हैं। हँसी मानसिक रोगों के उपचार का प्रभावशाली- माध्यम होता है। खुलकर हँसने से रक्त की गति बढ़ जाती है एवं रक्त परिभ्रमण में आने वाले अवरोधक तत्व दूर होने लगते हैं। श्वसन क्रिया सुधरती है।

ऑक्सीजन का संचार अधिक मात्रा में होने लगता है और दूषित वायु का पूर्ण निष्कासन होता है। शरीर के अधिकांश चेतना केन्द्र जागृत होने लगते हैं। अधिक हँसने वाले बच्चे फुर्तीले एवं अपेक्षाकृत- अधिक शक्तिशाली होते हैं। १० मिनट हँसने मात्र से इतनी ऊर्जा मिलती है जो साधारणतया लगभग एक किलोमीटर प्रात: स्वच्छ वातावरण में भ्रमण करने से प्राप्त होती है। अमेरिका के प्रख्यात कॉर्डियोलॉ- जिस्ट डॉ. विलियम प्रर्ड के अनुसार एक मिनिट का हँसना लगभग ४० मिनिट के बराबर होता है। मेक अस लॉफ में उन्होंने लिखा हँसने से दर्द से छुटकारा मिलता है। रक्त चाप सुधरता है। रक्त नलिकाएँ साफ होती हैं। रक्त संचार सुधरता है। हास्य से जो हारमोन्स बनते हैं, वे गठिया, एलर्जी एवं वात रोगों से मुक्ति दिलाते हैं दर्द दूर करते हैं। हँसने से चेहरे की माँसपेशिया- ँ सक्रिय होती हैं। उसमें झुर्रियाँ नहीं पड़ती। अनिद्रा, तनाव,भय,निर- शा आदि दूर होते हैं। श्वसन आदि रोगों में विशेष लाभ होता है। हँसी से शरीर में वेग के साथ ऑक्सीजन का अधिक संचार होने से माँसपेशिया- ँ सशक्त होती हैं। जमे हुए विजातीय, अनुपयोगी, अनावश्यक तत्व अपना सथान छोड़ने लगते हैं, जिससे विशेष रूप से फैफड़े और हृदय की कार्य क्षमता बढ़ती है। अवरोध समाप्त होने से रक्त का प्रवाह संतुलित होने लगता है। शरीर स्वस्थ एवं बलिष्ठ होने लगता है। हँसी से शरीर में ताजगी आती है। अच्छी स्वाभाविक निद्रा आती है। बुखार दूर हो जाता है। दर्द और पीड़ा में राहत मिलती है। वास्तव में हँसी सभी प्रकार के रोगों में प्राय: लाभकारी होती है।हृदय रोगियों के हृदय की शल्य चिकित्सा का हास्य चिकित्सा एक सरलतम एवं प्रभावशाली- उपचार है। दु:खी, चिन्तित, तनावग्रस्त- , भयभीत, निराश क्रोधी आदि हँस नहीं सकते। यदि उन्हें किसी कारण से हँसी आती है तो उस समय तनाव, चिंता, भय, दु:ख, क्रोध आदि उस समय उनमें रह नहीं सकते, क्योंकि दोनों एक दूसरे के विरोधी स्वभाव के होते हैं। अत: यदि हम काल्पनिक हँसी भी हँसेंगे तो तनाव, चिंता, भय, निराशा आदि स्वत: दूर हो जाते हैं। ये ही कारण हैं होते हैं जो व्यक्ति को अस्वस्थ, असंतुलित, रोगी बनाने में महत्वपूर्ण- भूमिका निभाते हैं। हँसने से शरीर के आंतरिक भाग की सहज मालिश हो जाती है। अंत:स्रावी ग्रंथियाँ और ऊर्जा चक्र सजग और क्रियाशील होने लगते हैं, जिससे रोग प्रतिकारात- ्मक क्षमता बढ़ती है। मन में सकारात्मक चिन्तन, मनन होने लगता है। शुभ विचारों का प्रादुर्भा- व होता है। नकारात्मक भावनाएँ समाप्त होने लगती हैं। आज के तनावयुक्त वातावरण से मुक्त होने के लिए हास्य योग सरलतम, स्वयं के पास , सभी समय उपलब्ध सहज, सस्ता साधन है।

मुस्कुर- ाना मानव व्यवहार की सहज क्रिया हैं

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