GANGA (in Hindi)

अम्मा गंगा

(गंगा सबसे पवित्रतम नदी है; इसे पतितपावनी – लोगों के पाप को धोने वाली कहकर इसका महत्व बताया गया है)

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को गंगा सप्तमी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को गंगा स्वर्ग से शिव की जटाओं में अवतरित हुई थी। यही कारण है कि इस दिन को गंगा सप्तमी कहते हैं, जिसे गंगा जन्मोत्सव के नाम से भी पुकारा जाता है। कलियुग में गंगा के चमत्कार से; महादेव के प्रति, आपका सिर खुद-ब-खुद श्रद्धावश झुक जाएगा| “अल्लाह मोरे अइहैं, मुहम्मद मोरे अइहैं। आगे गंगा थामली, यमुना हिलोरे लेयं। बीच मा खड़ी बीवी फातिमा, उम्मत बलैया लेय.
……दूल्- ा बने रसूल।’’ इन पंक्तियों को पढ़कर भला कौन नकार सकता है कि अम्मा गंगा के ममत्व का महत्व सिर्फ हिन्दुओं के लिये नहीं, समूचे हिन्दुस्ता- न के लिये है। मां गंगा 24 घंटे महादेव का अभिषेक करती हैं, कहते हैं, जिसने भी मां के इस रूप के दर्शन कर लिए उसकी कोई भी मुराद बाकी नहीं रहती | शिव की शक्ति, गंगा की भक्ति की ये वो अनूठी तस्वीर है | कलियुग में भगवान का ये रूप और उनका चमत्कार नास्तिक को भी आस्तिक बना देता है| मां गंगा यहां महादेव का अभिषेक करती हैं, वह भी 24 घंटे. झारखंड के रामगढ़ जिले के महादेव मंदिर में भक्त जब अपने आराध्य की पूजा करने पहुंचते हैं तो वे यहां इसी श्रद्धा को देखते हैं | इस मंदिर में शिवलिंग के ठीक ऊपर मां गंगा विराजमान हैं; इनकी नाभि से 24 घंटे जल की धारा बहती है| इस धारा में शिव भीगते रहते हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं, ये जल कहां से आता है ये कोई नहीं जानता. सूखा हो या बरसता, सर्दी हो या गर्मी, गंगा की नाभि से जल बहना कभी बंद नहीं होता.| 1925 में जब अंग्रेज रेल लाइन बिछाने के लिए जमीन की खुदाई करवा रहे थे; खुदाई के दौरान उन्हें जमीन में गुंबदनुमा किसी चीज का अहसास हुआ; देखने पर यह मंदिर सामने आया| इस बात का पता लगाने की बहुत कोशिश की गई कि ये जल आता कहां से है, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. और जब यह भेद नहीं खुल सका तो फिर इसे महादेव का चमत्कार मानकर इस सवाल को हमेशा के लिए छोड़ दिया गया|सारे रिश्ते- जेठ दुपहरी; गर्म हवा आतिश अंगारे

झरना- दरिया झील समंदर; भीनी-सी पुरवाई अम्मा

वाल्मीकि कृत गंगाष्टम्, स्कन्दपुरा- ण, विष्णु पुराण, ब्रह्मपुरा- ण, अग्नि पुराण, भागवत पुराण, वेद, गंगा स्तुति, गंगा चालीसा, गंगा आरती और रामचरितमान- स से लेकर जगन्नाथ की गंगालहरी तक गंगा का उल्लेख उन्हीं गुणों के साथ मिला, जो सिर्फ एक माँ में ही सम्भव हैं, किसी अन्य में नहीं। त्याग और ममत्व! सिर्फ देना ही देना, लेने की कोई अपेक्षा नहीं। शायद इसीलिये माँ को तीर्थों में सबसे बड़ा तीर्थ कहा गया है गंगा को। गुजरात के सूरत जिले के ओलपाड में बने सिद्धनाथ मंदिर में स्थापित इस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि ये स्वयंभू है | सैकड़ों सालों से खंडित अवस्था में है; सैकड़ों साल पहले सिद्धनाथ महादेव मंदिर को लुटेरों ने लूटने की कोशिश की; लुटेरों को लगा कि शिवलिंग के नीचे खजाना छिपा है इसलिए उन्होंने शिवलिंग पर कुल्हाड़ी से कई प्रहार किए, जिससे इसमें छेद हो गए, तब महादेव क्रोधित होकर इन छिद्रों से भंवरों के रुप में प्रकट हुए और उन्होंने लुटेरों को मार भगाया. मंदिर के पुजारी जनक भाई ने बताया कि लुटेरे तो भाग गए लेकिन मंदिर की पवित्रता लौटाने के लिए महादेव को गंगा का आह्वान करना पड़ा | शिव की आज्ञा से शिवलिंग में प्रकट हुयी गुप्त गंगा आज भी इसमें अपनी लय में बहती हैं; वैसे हिन्दू शास्त्रों के मुताबिक खंडित शिवलिंग की आराधना नहीं की जानी चाहिए, लेकिन यहां न केवल महादेव के इस चमत्कारी रूप की पूजा की जाती है बल्कि विधि-विधान का पालन भी किया जाता है. पूजा से पहले महादेव को शिवलिंग से निकलने वाले जल से ही स्नान कराया जाता है. भक्त शिव के इस रूप के दर्शन कर निहाल हो जाते हैं|

गंगा का एक परिचय वराह पुराण में उल्लिखित शिव की उपपत्नी और स्कन्द कार्तिकेय की माता के रूप में है। दूसरा परिचय राजा शान्तनु की पत्नी और एक ऐसी माँ के रूप में है, जिसने पूर्व कर्मों के कारण शापित अपने पुत्रों को तारने के लिये आठ में सात के पैदा करने के तुरन्त बाद ही मार दिया। पिता राजा शान्तनु के मोह के कारण और शाप के कारण भी जीवित बचे आठवें पुत्र ने गंगादत्त, गांगेय, देवव्रत, भीष्म के नाम ने ख्याति पाई।

सन्त रैदास, रामानुज, वल्लभाचार्- य, रामानन्द, चैतन्य महाप्रभु.. सभी ने गंगा के मातृस्वरूप- को ही प्रथम मान महिमागान गाए। महाबलीपुरम- ्, अमरावती, उदयगिरि, देवगढ़, भीतरगाँव, दहपरबतिया, पहाड़पुर, जागेश्वर, बोधगया, हुगली, महानद से लेकर भेड़ाघाट के चौंसठ योगिनी मन्दिर आदि कितने ही स्थानों में गया। इनमें स्थापित गुप्तकालीन- , शुंगकालीन, पालकालीन और पूर्व मध्यकालीन इतिहास प्रतिमाओं में कितनी ही प्रतिमाए गंगा की पाईं। कहीं यक्षिणी, तो कहीं देवी प्रतिमा के रूप में स्थापित इन गंगा मूर्तियों में मातृत्व भाव ही परिलक्षित होता है। कोई और भाव जगता ही नहीं। महर्षि दयानन्द के चिन्तन ने समाज को एक नूतन आलोक दिया! नालन्दा, तक्षशिला, काशी, प्रयाग – अतीत के सिरमौर रहे चारों शिक्षा केन्द्र गंगामृत पीकर ही लम्बे समय तक गौरवशाली बने रह सके। आर्यभारत के जमाने में आर्थिक और कालान्तर में जैन तथा बौद्ध दोनों आस्थाओं के विकास का मुख्य केन्द्र रहा पाटलिपुत्र- !

बुद्ध-महाव- र के विहार, अशोक-अकबर-ह- ्ष जैसे सम्राटों के गौरव पल.. तुलसी-कबीर– ानक की गुरूवाणी भी इसी गंगा की गोद में पुष्पित-पल- लवित हुई है। इसी गंगा के किनारे में तुलसी का रामचरित, आदिगुरु शंकराचार्य- का गंगाष्टक और पाँच श्लोकों में लिखा जीवन सार – मनीषा पंचगम, जगन्नाथ की गंगालहरी, कर्नाटक संगीत के स्थापना पुरुष मुत्तुस्वा- मी दीक्षित का राग झंझूती, कौटिल्य का अर्थशास्त्- र, टैगोर की गीतांजलि और प्रेमचन्द्- र के भीतर छिपकर बैठे उपन्यास सम्राट ने जन्म लिया। शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्ला- ह खाँ की शहनाई की तान यहीं परवान चढ़ी। आचार्य वाग्भट्ट ने गंगा के किनारे बैठकर ही एक हकीम से तालीम पाई और आयुर्वेद की 12 शाखाओं के विकास किया।

गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। मिथकों के अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु के पैर के पसीने की बूँदों से गंगा का निर्माण किया। त्रिमूर्ति- के दो सदस्यों के स्पर्श के कारण यह पवित्र समझा गया। एक अन्य कथा के अनुसार राजा सगर ने जादुई रूप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की। एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिये घोड़ा आवश्यक था जो ईर्ष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया अंत में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच कर कि ऋषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया। तपस्या में लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गये। सगर के पुत्रों की आत्माएँ भूत बनकर विचरने लगीं क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। सगर के पुत्र अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का असफल प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी। भगीरथ राजा दिलीप की दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके अंतिम संस्कार कर, राख को गंगाजल में प्रवाहित किया जा सके और भटकती आत्माएं स्वर्ग में जा सकें। भगीरथ ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके। ब्रह्मा प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुये और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बाद पाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊँचाई से जब पृथ्वी पर गिरूँगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रो- का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं। इसी प्रकार एक पौराणिक कथा राजा शांतनु और गंगा के विवाह तथा उनके सात पुत्रों के जन्म की है।

गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है जो कुमायूँ में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनद से निकलती है। गंगा के इस उद्गम स्थल की ऊँचाई ३१४० मीटर है। यहाँ गंगा जी को समर्पित एक मंदिर भी है। गंगोत्री तीर्थ, शहर से १९ कि॰मी॰ उत्तर की ओर ३८९२ मी.(१२,७७० फी.) की ऊँचाई पर इस हिमनद का मुख है। यह हिमनद २५ कि॰मी॰ लंबा व ४ कि॰मी॰ चौड़ा और लगभग ४० मी. ऊँचा है। इसी ग्लेशियर से भागीरथी एक छोटे से गुफानुमा मुख पर अवतरित होती है। इसका जल स्रोत ५००० मी. ऊँचाई पर स्थित एक बेसिन है। इस बेसिन का मूल पश्चिमी ढलान की संतोपंथ की चोटियों में है। गौमुख के रास्ते में ३६०० मी. ऊँचे चिरबासा ग्राम से विशाल गोमुख हिमनद के दर्शन होते हैं। इस हिमनद में नंदा देवी, कामत पर्वत एवं त्रिशूल पर्वत का हिम पिघल कर आता है। यद्यपि गंगा के आकार लेने में अनेक छोटी धाराओं का योगदान है लेकिन ६ बड़ी और उनकी सहायक ५ छोटी धाराओं का भौगोलिक और सांस्कृतिक- महत्त्व अधिक है। अलकनंदा की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। धौली गंगा का अलकनंदा से विष्णु प्रयाग में संगम होता है। यह १३७२ मी. की ऊँचाई पर स्थित है। फिर २८०५ मी. ऊँचे नंद प्रयाग में अलकनन्दा का नंदाकिनी नदी से संगम होता है। इसके बाद कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा का कर्ण गंगा या पिंडर नदी से संगम होता है। फिर ऋषिकेश से १३९ कि॰मी॰ दूर स्थित रुद्र प्रयाग में अलकनंदा मंदाकिनी से मिलती है। इसके बाद भागीरथी व अलकनन्दा १५०० फीट पर स्थित देव प्रयाग में संगम करती हैं यहाँ से यह सम्मिलित जल-धारा गंगा नदी के नाम से आगे प्रवाहित होती है। इन पांच प्रयागों को सम्मिलित रूप से पंच प्रयाग कहा जाता है। इस प्रकार २०० कि॰मी॰ का संकरा पहाड़ी रास्ता तय करके गंगा नदी ऋषिकेश होते हुए प्रथम बार मैदानों का स्पर्श हरिद्वार में करती है। वडोदरा में गल्तेश्वर मंदिर में भी गुप्त गंगा बहती है. यह गंगा महादेव के चरण धोती है. गंगा के यहां गलती नदी के नाम से पुकारते हैं भक्त. कहते हैं गल्तेश्वर महादेव के चरणों का स्पर्श करने के लिए मां गंगा यहां अपनी राह बदल कर आती हैं. इसके अलावा छत्तीसगढ़ में एक लाख छेद वाले शिवलिंग में गंगा और यमुना दोनों की ही वास है. भक्तों को यहां महादेव के साथ-साथ मां गंगा और यमुना का आशीर्वाद भी मिलता है |

भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। बहुत से पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं जिनमें वाराणसी और हरिद्वार सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं यह मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है। मरने के बाद लोग गंगा में राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या अंतिम संस्कार की इच्छा भी रखते हैं। इसके घाटों पर लोग पूजा अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए मकर संक्रांति, कुंभ और गंगा दशहरा के समय गंगा में नहाना या केवल दर्शन ही कर लेना बहुत महत्त्वपूर- ्ण समझा जाता है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर गंगा के तट पर ही बने हुए हैं। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक- एकता स्थापित करते हैं।[29] गंगा को लक्ष्य करके अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं। जिनमें श्रीगंगासह- स्रनामस्तो- त्रम् और आरती सबसे लोकप्रिय हैं। अनेक लोग अपने दैनिक जीवन में श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग करते हैं। गंगोत्री तथा अन्य स्थानों पर गंगा के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जिनके दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। उत्तराखंड के पंच प्रयाग तथा प्रयागराज जो इलाहाबाद में स्थित है गंगा के वे प्रसिद्ध संगम स्थल हैं जहाँ वह अन्य नदियों से मिलती हैं। ये सभी संगम धार्मिक दृष्टि से पूज्य माने गए हैं।

भारत की राष्ट्र-नद- गंगा जल ही नहीं, अपितु भारत और हिंदी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष- ्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में ‘श्रीगंगाल- री’ नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि महाकाव्य पृथ्वीराज रासो[क] तथा वीसलदेव रास[ख] (नरपति नाल्ह) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रंथ जगनिक रचित आल्हखण्ड[ग] में गंगा, यमुना और सरस्वती का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। शृंगारी कवि विद्यापति, कबीर वाणी और जायसी के पद्मावत में भी गंगा का उल्लेख है, किन्तु सूरदास और तुलसीदास ने भक्ति भावना से गंगा-माहात- म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड- में ‘श्री गंगा माहात्म्य’- का वर्णन तीन छन्दों में किया है- इन छन्दों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है। रीतिकाल में सेनापति और पद्माकर का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए गंगालहरी नामक ग्रंथ की रचना की है। सेनापति कवित्त रत्नाकर में गंगा माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार सी सुशोभित है। रसखान, रहीम आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में जगन्नाथदास- रत्नाकर के ग्रंथ गंगावतरण में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए भगीरथ की ‘भगीरथ-तपस्- ा’ से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह सर्गों में विभक्त और रोला छन्द में निबद्ध है। अन्य कवियों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्- र, सुमित्रानन- ्दन पन्त और श्रीधर पाठक आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है। छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन- ्दन पन्त ने ‘नौका विहार’ में ग्रीष्म कालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्म- क अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है। हिन्दू धर्मग्रंथो- ं में देवी गंगा का वाहन मकर यानी मगरमच्छ का उल्लेख मिलता है, जो जलीय प्राणियों में सर्वाधिक शक्तिशाली और परम वेगवान माना गया है। मकर या मगरमच्छ एक प्रतीक है, जो बताता है हमें जल में रहने वाले हर प्राणी की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि जल में रहने वाला हर प्राणी पारिस्थिति- क तंत्र के लिए महत्वपूर्ण- है और उसकी अनुपस्थिति- में पारिस्थिति- क तंत्र बिगड़ जाएगा।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.