Feelings for Trees in India (in Hindi)

भारत में वृक्ष संस्कृति

वन कुल भूमि क्षेत्र के ५०% भाग में फेले हुए थे। वन जीव जन्तुओं के लिए आवास स्थल, जल-चक्र को प्रभावित करते हैं और मृदा संरक्षण के काम आते हैं इसी कारण यह पृथ्वी के जैवमण्डल का अहम हिस्सा कहलाते हैं। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत- र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं| पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मां स्वरूप माना गया ह -.
ग्रह-नक्षत- ्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं|हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है, इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण- मानते हुए कहा है- ‘वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन- ्न सम्भव:’ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है | जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु- ‘ यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण- आश्रमों में से ब्रह्मचर्य- , वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है | वन सभी क्षेत्रों के पेड़ की वृद्धि बनाए रखना में सक्षम, में ने पाया जा सकता है पेड़ लाइनको छोड़कर, जहां प्राकृतिक आग आवृत्ति भी, या अधिक है जहाँ पर्यावरण प्राकृतिक प्रक्रियाओ- ं या मानवीय गतिविधियों- के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। एक सामान्य नियम के रूप से वनों का प्रभुत्व अन्गिओस्पे- र्म्स – ब्रोअद्लेअ- फ़ जंगलों और अधिक प्रजातियों- -उन लोगों का प्रभुत्व से अमीर हैं ग्य्म्नोस्- पेर्म्सशंक- ुवृक्ष, पर्वतीय, या नीद्लेलेअफ- ़ जंगलों, हालांकि अपवाद मौजूद हैं। वन कभी कभी एक छोटे से क्षेत्र के भीतर – के रूप में कई प्रजातियों- के पेड़ शामिल उष्णकटिबंध- ीय वर्षा और समशीतोष्ण पर्णपाती वन, या बड़े क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत- कुछ प्रजातियां- (जैसे, टैगा और शुष्क पर्वतीय शंकुधारी वन)। वन अक्सर कई पौधे और पशु प्रजातियों- , के लिये घर होता है और बायोमास इकाई क्षेत्र प्रति उच्च अन्य वनस्पति समुदायों की तुलना में है। बहुत कुछ इस बायोमास जो की जड़ प्रणालियों- में जमीन के नीचे मैं पैदा होता है और बाकि आंशिक रूप से अपरद। संयंत्र होता है एक जंगल के वुडी घटक मैं शामिल हैं लिगनिन है, जो अपेक्षाकृत- धीमी करने के लिए है घुल जाना अन्य कार्बनिक पदार्थों की तुलना मैं सेलूलोज़ या कार्बोहाइड- ्रेट |

पेड़-पौधों की पूजा, अर्चना, वंदना एवं प्रार्थना के पीछे कर्मकाण्ड नहीं अपितु इनके पीछे कई मानवोपयोगी- वैज्ञानिक तथ्य छिपे हुए हैं। जो किसी न किसी रूप में स्वास्थ्य एवं आयुर्वेद की दृष्टि में उपयोगी तथा पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से धार्मिक आस्था के रूप में योगदान देते हैं।

प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक ऋषि-मुनियो- को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी, वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई मौकों पर गंभीर भूल कर सकता है, अपना ही भारी नुकसान कर सकता है, इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके|

पीपल का वृक्ष सर्वाधिक आक्सीजन देता है वहीं आयुर्वेद अर्थात् चिकित्सकीय- दृष्टि से इस वृक्ष की छाल से उत्तम टेनिन की प्राप्ति होती है जो जीवाणु रोधक होती है। इसके फल गुणकारी होते हैं, इससे चर्मरोग एवं फेफड़ों के रोग दूर होते हैं। आयुर्वेद के मतानुसार तुलसी, चरपरी, कटु, अग्नि दीपक हृदय के लिए हितकारी, गर्मी दाह तथा पित्त नाशक और कुष्ठ, मूत्रकृच्छ- , रक्ताविकार- , पसली की पीड़ा कफ तथा वात नाशक है तुलसी का प्रयोग विभिन्न प्रकार के रोग ज्वर, मन्दाग्नि, उदर शूल, कप-खाँसी आदि को दूर करने में सहायक होती है। वट वृक्ष को हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण- स्थान प्राप्त है। जैन तीर्थंकर ऋषभ देव को वट वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अतः जैन धर्म में इसे केवली वृक्ष कहा जाता है। वट वृक्ष भीषण गर्मी में राहत प्रदान करता है तथा इसकी टहनियों के द्वारा पृथ्वी की श्वसन क्रिया उचित ढंग से संचालित होती है।

भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण- संस्कार है| यह सब होने के बाद भी भारत में भौतिक विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति पददलित हुई है, लेकिन, यह भी सच है कि यदि ये परंपराएं न होतीं तो भारत की स्थिति भी गहरे संकट के किनारे खड़े किसी पश्चिमी देश की तरह होती| हिन्दू परंपराओं ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है. हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है| महाभारत के एक पर्व में कहा गया है कि पर्ण और फलों से समन्वित कोई भी सुन्दर वृक्ष इतना सजीव एवं जीवंत हो उठता है कि वह पूजनीय हो जाता है –

एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत् पर्णफलान्व- ितः। चैत्यो भवति निर्ज्ञाति- रर्चनीयः सुपूजितः।

समुद्र मंथन से वृक्ष जाति के प्रतिनिधि के रूप में कल्पवृक्ष का उद्भव होना एवं देवताओं द्वारा उसे अपने संरक्षण में लेना वृक्षों की महत्ता को अवगत कराते हैं पृथ्वी सूक्त में लिखा है कि वन तथा वृक्ष वर्षा लाते हैं, मिट्टी को बहाने से बचाते हैं साथ ही बाढ़ तथा सूखे को रोकते हैं तथा दूषित गैसों को स्वयं पी जाते हैं। यही कारण है कि पुरातन काल में वृक्षों का देवता के समान पूजन किया जाता था। हमारे ऋषि-मुनि एवं पुरखे इसलिये कोई भी कार्य करने से पूर्व प्रकृति को पूजना नहीं भूलते थे –

अश्वत्थो वटवृक्ष चन्दन तरुर्मन्दा- र कल्पौद्रुम- ौ। जम्बू-निम्- -कदम्ब आम्र सरला वृक्षाश्च से क्षीरिणः।।-

वृक्षों को देवताओं का निवास स्थान माना है। वट, पीपल, आँवला, बेल, कदली, पदम वृक्ष तथा परिजात को देव वृक्ष माना गया है। भारतीय संस्कृति से धार्मिक कृत्यों में वृक्ष पूजा का अत्यधिक महत्व है। पीपल (अश्वत्थ) को शुचिद्रुम, विप्र, यांत्रिक, मंगल्य, सस्थ आदि नामों से जाना जाता है। पीपल को पूज्य मानकर उसे अटल प्रारब्ध जन्य कर्मों से निवृत्ति कारक माना गया है। पीपल को अखण्ड सुहाग से भी सम्बन्धित किया गया है। लोक परम्परा के अनुसार संतान की इच्छुक स्त्रियाँ उसकी पूजा अभ्यर्थना करती हैं। मान्यता है कि पीपल की परिक्रमा करने से जन्म-जन्मा- तरों के पाप-ताप मिट जाते हैं। चित्त निर्मल होता है। अश्वत्थ की महिमा वेदों-पुरा- ों में जगह-जगह देखने को मिलती है।

तुलसी को वायु शोधन एवं पवित्रता के लिए हर आँगन में लगाने की प्रथा है क्योंकि तुलसी को सर्वाधिक आक्सीजन प्रदायक पौधा माना जाता है। इसका पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसके पास हानिकारक जीवाणु-विष- णु या कीड़े-मकोड़े नहीं पनपते। यह घातक कृमि और कीटों को नष्ट करती है। भोजन में तुलसी का भोग पवित्र माना गया है, जो कई रोगों की रामवाण औषधि है। भारतीय संस्कृति में बिल्व वृक्ष को भगवान शंकर से जोड़ा गया है। इसकी पत्तियों को शिवलिंग पर चढ़ाने का विधान है। परन्तु वावन पुराण में बिल्व पत्र को लक्ष्मी से उद्भव मानते हैं। इसमें लक्ष्मी का वास भी माना जाता है। इसे अथर्ववेद में महान ’वै भद्रो बिल्वो महान भद्र उदुम्बरः।‘- अर्थात् औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण इसकी तुलना उपकारी पुरुष से की गई है। वामन पुराण में कदम्ब का जन्म कामदेव के माध्यम से किया गया है। कदम को भगवान विष्णु, लक्ष्मी एवं यशोदा नंदन कृष्ण से भी जोड़ा गया है – ढाक, पलाश, दूर्वा एवं कुश जैसी वनस्पतियों- को नवग्रह पूजा आदि धार्मिक कृत्यों में प्रयुक्त किया जाता है। इसके साथ ही अशोक, चम्पा अरिष्ट, पुन्ताग, प्रियंगू, शिरीश, उदूम्बर तथा पारिजात को शुभ माना गया है। इनमें देवताओं का निवास स्थान अथवा देवत्व शक्ति मानी गयी है। इन वृक्षों के सानिध्य से मनुष्य में तेज, ओज तथा वीर्यवान होने की सम्भावना सुनिश्चित है। वाराह-मिहि- , कश्यप संहिता तथा विश्वकर्मा- -प्रकाश आदि बहुमूल्य ग्रन्थों में लिखा है बाग लगाना हो तो सर्वप्रथम इन प्रमुख वृक्षों को लगाना चाहिए| इसी तरह से भगवान विष्णु को बाल रूप में वट पत्रशायी कहा गया है। स्त्रियाँ वट सावित्री की पूजा ज्येष्ठ अमावस्या को करती है। वे अपने पति के दीर्घायुष्- य एवं मंगल कामना के लिए व्रत रखकर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं। नीम की पूजा का भी प्रचलन है। नीम के पेड़ का प्रेत बाधा के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ आदिवासी एवं अन्य जातियाँ इसमें देवी का वास तथा नाग पूजा के रूप में पूजती हैं।

भारतीय परम्पराओं के अलावा बौद्ध और जैन साहित्य में वन-यात्राओ- एवं वृक्ष महोत्सवों का सुन्दर वर्णन मिलता है। बौद्ध एवं जैन परम्पराओं में वृक्षों को सम्मान एवं अदब की दृष्टि से देखा गया है। भगवान बुद्ध को पीपल के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। तभी से उसे बोधिवृक्ष कहा जाता है। बोधिवृक्ष की पूजा के दृश्य का बोधगया, साँची, मथुरा, अमरावती आदि स्थानों से प्राप्त शुंगकला में सुन्दर अंकन हुआ है। साँची के तोरण में वृक्षों का अलंकरण अत्यन्त मनोहारी है। इसमें शाल, अशोक, चंपा एवं पलाश वृक्षों का सजीव एवं अनुपम वर्णन मिलता है। वन-उपवन शोभा और समृद्धि के आगम थे। ये वैरागियों के लिये मुक्ति पाने के साधन, वानप्रस्थ जीवन के आधार पर सन्यासी, तपस्वी, योगी और भिक्षुओं के लिए शरण स्थल थे। बोधिचर्याव- नार (८/४०-४३) में वनों और वृक्षों के सम्बन्ध में कहा गया है कि वृक्ष सदैव देते रहने की प्रवृत्ति रखते हैं। भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को गृहों में वास करने की अपेक्षा वृक्षों के नीचे वास करने का आदेश दिया था। प्राचीन काल में वन-उपवन में एकत्र होकर वृक्ष महोत्व और बसंतोत्सव मनाने की परम्परायें- थी। “ग्रीक परम्परा में एडोडिनाअरि- स, ओरिसस, डिमीटर जन्य या वनस्पति के देवता माने गए हैं। डायनिसस मदिरा और अंगूरलता का देवता था। एकेसियन आर्टेमिस देवता का आवास ओक वृक्ष के कोटर में माना जाता था।” भारत के इन्द्र महोत्सव जो हरियाली एवं धरती के शस्य श्यामला तथा विश्वव्याप- ी प्रजनन और पृथ्वी की कोख में से पनपने वाली वनस्पतियों- की दृष्टि से मनाया जाता है यही इन्द्र महोत्सव की तुलना यूरोप के स्मे-पोल उत्सव से की जाती है जो कनाडा और अमरीका में अत्यन्त लोकप्रिय है। पूर्वी अफ्रीका के बानिका नामक कबीले में पेड़ काटना मातृहंता जैसा जघन्य पाप माना जाता है। वहीं केन्द्रीय आस्ट्रेलिय- ा के डीटी कबीले के लोग पेड़ों को अपने पूर्वजों का रूपान्तरण मानते हैं। फिलीपीन द्वीपवासी भी उन पर अपने पूर्वजों की आत्मा का वास मानते हुए उन्हें पुरोहित की आज्ञा से ही काटते हैं। विश्व के कई देशों में कबीले में रहने वाले लोग फल देने वाले वृक्षों की देखभाल एक परिवार के सदस्य के रूप में करते हैं, यहाँ तक कि उन वृक्षों के आसपास आग जलाना, शोर मचाना वर्जित माना जाता है जिससे कि वे भयभीत न हों।

हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है:-

‘दशकूप समावापी: दशवापी समोहृद:।

दश- ृद सम:पुत्रो दशपत्र समोद्रुम:।-

परिवार की सामान्य गृहिणी भी अपने अबोध बच्चे को समझाती है कि रात में पेड़-पौधे को छूना नहीं चाहिए, वे सो जाते हैं, उन्हें परेशान करना ठीक बात नहीं. वह गृहिणी परम्परावश ऐसा करती है | उसे इसका वैज्ञानिक कारण नहीं मालूम. रात में पेड़ कार्बन डाइ ऑक्सीजन छोड़ते हैं, इसलिए गांव में दिनभर पेड़ की छांव में बिता देने वाले बच्चे-युवा– ुजुर्ग रात में पेड़ों के नीचे सोते नहीं हैं | अग्नि को जल से बुझाया जा सकता है, तीव्र धुप में छाते द्वारा बचा जा सकता है, जंगली हाथी को भी एक लम्बे डंडे(जिसमे हुक लगा होता है ) की मदद से नियंत्रित किया जा सकता है, गायों और गधों से झुंडों को भी छड़ी से नियंत्रित किया सकता है। अगर कोई असाध्य बीमारी हो तो उसे भी औषधियों से ठीक किया जा सकता है। यहाँ तक की जहर दिए गए व्यक्ति को भी मन्त्रों और औषधियों की मदद से ठीक किया जा सकता है। इस दुनिया में हर बीमारी का इलाज है लेकिन किसी भी शाश्त्र या विज्ञान में मूर्खता का कोई इलाज या उपाय नहीं है।

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